सोमवार, 22 जनवरी 2024

बौद्ध धर्म,भगवान बुद्ध का परिचय

 बौध धर्म

बौध धर्म एक भारतीय धर्म है जो गौतम बुद्ध के ज्ञान को प्रसारित करता है उनके वचनों का अनुसरण करता है. इसकी उत्पत्ति 5वी सदी ५६३ ईसा. पूर्व. में पूर्वी गंगा के मैदान में हुई थी जो धीरे-धीरे पुरे एशिया में फ़ैल गयी. यह दुनिया का चौथा सबसे बड़ा धर्म है जिसके 2 अरब से भी अधिक अनुयायी है. बुद्ध का अर्थ जाग्रत व्यक्ति होता है यह नाम उनकों ज्ञान प्राप्त होने के बाद पड़ा था. जो श्रमण परंपरा को मानते थे. प्राचीन भाषा में इन्हें शाक्य मुनि कहा जाता था. बुद्ध ने प्रथम धर्म उपदेश अपने साथी साधुओं को दिया था . उन्होंने चार सत्य और अष्टांगिक मार्ग को अपनाकर धर्म का उपदेश सुरु किया था.   

बौद्ध धर्म,भगवान बुद्ध का परिचय

गौतम बुद्ध का परिचय

गौतम बुद्ध एक भारतीय शाक्य मुनी थे जिन्होंने बौद्ध धर्म की स्थापना की थी इन्हें बोधगया में एक पीपल के पेड़ के निचे  ज्ञान प्राप्त हुआ था. कथा अनुसार इनका जन्म 563 ईसा. पूर्व. के लगभग शाक्यों की राजधानी कपिलवस्तु के निकट लुंबिनी वन में हुआ था वर्त्तमान में यह स्थान भारत से 7 किलोमीटर दूर नेपाल में स्थित है. यह हिमालय के निकट कोशल में रहने वाले गौतम गोत्र के कहलाते थे. उनके पिता का नाम राजा शुध्दोदन तथा माता मायादेवी थी. बुद्ध के जन्म का नाम सिद्धार्थ था.जन्म के कुछ ही दिन में उनकी माता का देहांत हो गया था. जिसके पश्चात उनका पालन-पोषण उनकी विमाता गौतमी द्वारा हुआ था. बुद्ध के नामकरण के समय असित मुनि ने इनके कुंडली में बत्तीस महापुरुष लक्षणों को देखकर भविष्यवाणी की थी की एक महान सन्यासी बनेंगा. लेकिन पिता चाहते थे की वो राजा बने इसलिए उन्होंने शिक्षा के साथ अस्त्र-शस्त्र में भी पारंगत किया किन्तु उनके अन्दर वैराग्य उत्पन्न होने लगते थे. कुछ समय बाद पिता के कहने पर उन्होंने दण्डपाणी की पुत्री यशोधरा के साथ उनका विवाह हो गया. विवाह उपरांत उनके पुत्र राहुल हुए. भविष्यवाणी को ध्यान में रखते हुए राजा शुद्धोदन ने बुद्ध के लिए विशिष्ट प्रासाद महलों का निर्माण करवाया था. ताकि उनका मन वैराग्य की ओर ना जाए ,इसके लिए राजा ने हर संभव प्रयास किया किन्तु भाग्य का लिखा कोई नही टाल सकता था. सिद्धार्थ लोगो के दुःख दर्द का देखकर अत्यंत दुखी हो जाते थे. जिनके बाद गौतम ने इनका कारण जानने का संकल्प लिया . आधी रात को पत्नी-पुत्र को छोड़कर  उन्होंने अपने राज्य का त्याग कर वन की ओर प्रस्थान हो गये. मात्र 29 की उम्र में सिद्धार्थ अनोमा नाम के नदी के तट पर उन्होंने प्रवज्या के वस्त्र धारण कर अपने प्रश्न की खोज में निकल गये. उन्हें रास्ते में एक सन्यासी मिले जिनके चार शिष्य थे कहा जाता है की इन्ही सन्यासी से सन्यास की सारी शिक्षा लेकर तप करना सुरु किया था. अन्न जल का त्याग कर 6 वर्षो तक तप किया किन्तु उन्हें ज्ञान प्राप्त नही हुआ लेकिन एक दिन कुछ स्त्रियाँ पीपल के पेड़ पर पूजा करने आये और एक गीत गा रहे थे. " विणा के तारों को ढीला मत छोड़ दो, ढीला छोड़ देने से उनका सुरीला स्वर नही निकलेगा, पर तारों को इतना कसों भी मत की वे टूट जाए". यह बात बुद्ध को पसंद आ गयी और समझ गए की किसी बात की अति ठीक नही होती है और भूखे-प्यासे रहने के बजे नियमित आहार से ही योग सिद्ध हो सकती है.  इसलिए उन्होंने उस मार्ग को त्याग कर दुसरे मार्ग को अपनाना ठीक समझा उसके बाद बुद्ध ने पीपल के पेड़ पर गहरे ध्यान में चले जाने का निर्णय लिया. काम,क्रोध,मृत्यु  पर विजय प्राप्त कर वैशाली पूर्णिमा के रात में उन्हें प्रथम विद्या पूर्व जन्मों की स्मृति, द्वितीय याम में दिव्य चक्षु,तृतीय याम में प्रतिय समुत्पाद का ज्ञान प्राप्त किया. ज्ञान प्राप्ति के बाद कुछ दिनों तक शांत बैठे रहे किन्तु ब्रम्हा ने उनसे धर्मचक्र प्रवर्तन का अनुरोध किया. भगवान बुद्ध ने प्रथम पंचवर्गीय शिष्य को उपदेश देकर धर्मचक्र का आदेश दिया. इन पंचवर्गीय शिष्य में श्रेष्ठि पुत्र यश और उसके संबंधी एवं मित्र सद्धर्म थे. इस प्रकार बुद्ध के साथ अन्य अनुयायी सभी दिशाओं में भगवन बुद्ध के वचनों का प्रसार किया और स्वंम बुद्ध उरुवेला के लिए प्रस्थान किया. उरुवेला में अहिंसा का प्रचार करते हुए उन्होंने जटिल कश्यपों को उनके एक सहस्त्र अनुयायिओं के साथ चमत्कार और उपदेश के द्वारा धर्म की दीक्षा प्रदान किया महाकश्यप जो बुद्ध के नजदीक शिष्य बन गए थे. इन्होने बौद्ध अधिवेशन की अध्यक्षता निभाई थी. इसके पश्चात मगध के राजा बिम्बिसार को धर्म का उपदेश दिया. रानी खेमा जो बिम्बिसार की रानी थी वह आगे चलकर बौद्ध धर्म की अच्छी शिक्षिका बनी. बिम्बिसार ने वेणुवन नामक उद्यान को भिक्षुसंघ को उपहार स्वरुप दिया. इसके साथ ही आनंद,अनिरुद्ध,महाकश्यप,रानी खेमा,महाप्रजापति,उपली,अंगुलिमाल उनके प्रमुख शिष्य बने. आनंद जो की बुद्ध के भाई थे जिनकी स्मरण शक्ति बहुत तेज थी. यह बुद्ध के साथ 20 वर्षो तक साथ रहें. इस प्रकार 80 वर्ष तक श्रावस्ती,राजगृह,वैशाली और कपिलवस्तु में भ्रमण कर धर्म का प्रचार किया. राजगृह से बुद्ध पाटली ग्राम होते हुए गंगा पार कर वैशाली पहुचे जहाँ प्रसिद्ध नगर वधु  आम्रपाली ने उनके भिक्षु संघ को भोजन कराया. अंतिम समय में चुंद कमार के आथित्य को स्वीकार किया जहाँ सुकर मधक खाने से खून की उलटी होनें लगी अर्थात रक्तविकार होना शुरु हुआ और शालवन में शाल वृक्ष के बीच लेट गए और अपनी अंतिम श्वास  ली. पाली परंपरा के अनुसार उनका अंतिम शब्द थए " सभी शरीर नाशवान है,आलस्य न करते हुये कार्य करते रहना चाहिए.

बुद्ध की शिक्षाए 

बुद्ध की शिक्षाओ को आर्य सत्य,अष्टांगिक मार्ग,दस पारमिता,पंचशील से समझी जा सकती है.

चार सत्य 

  •  दुःख - इस दुनिया में दुःख है. जन्म से मृत्यु तक सिर्फ दुःख ही दुःख है.
  • दुःख का कारण - अतृप्ति अर्थात अभिलाषा या और पाने की लालसा ही दुःख का कारण होता है.
  • दुःख का निरोध- तृष्णा या अभिलाषा से मुक्ति का रास्ता बुद्ध ने अष्टांगिक मार्ग को बताया था.
  • दुःख निरोध का मार्ग- अष्टांगिक मार्ग को बताया है.
अष्टांगिक मार्ग 

बुद्ध के अनुसार चार सत्यता की जाँच अष्टांगिक मार्ग द्वारा पता लगाया जा सकता है. इसकी निम्न मार्ग का अनुसरण करने को कहा था जो इस प्रकार है-

  1. सम्यक दृष्ठि - वस्तुओं को भली-भांति से जानना सम्यक दृष्ठि है.
  2. सम्यक संकल्प - द्वेष,हिंसा तथा निर्भरता से मुक्त विचार ही सम्यक संकल्प है.
  3. सम्यक वाक- सत्य वचन का पालन ही सम्यक वाक है.
  4. सम्यक कम्रांत- अच्छे कर्मो का पालन तथा बुरे कर्मों का त्याग करना 
  5. सम्यक आजीवन- सदाचारण का पालन करना ही समयक आजीवन है.
  6. सम्यक स्मृति- वस्तुओं की वास्तिविक स्वरुप के प्रति जागरूक ही सम्यक स्मृति है.
  7. सम्यक व्यायाम- उचित धर्मों का पालन व बुरे धर्मो का त्याग करना ही सम्यक व्यायाम है.
  8. सम्यक समाधि- चित्त की समुचित एकाग्रता ही सम्यक समाधि है.
पंचशील

भगवान बुद्ध ने अपने अयुयायियों को पांच शिलों का पालन करने की शिक्षा दी है.

  1. आहिंसा - मै प्राणी-हिंसा से विरत रहने की शिक्षा ग्रहण करता हूँ.
  2. अस्तेय - मै चोरी से विरत रहने की शिक्षा ग्रहण करता हूँ.
  3. अपरिग्रह- मै व्यभिचार से विरत रहने की शिक्षा ग्रहण करता हु.
  4. सत्य- मै सदा सत्य बोलने की शिक्षा ग्रहण करता हु.
  5. सभी नशा से विरत- मै पक्की शराब,कच्ची शराब,नशीली चीजों के सेवन से विरत रहने की शिक्षा ग्रहण करता हूँ.
 प्रमुख तीर्थ स्थल 

भगवान बुद्ध के अनुयायियों के लिए विश्व भर में पांच मुख्य तीर्थ स्थल है.

  • लंबिनी - यह भगवान बुद्ध के जन्म स्थल है जो नेपाल की तराई में स्थित है. 563 ईसा. पूर्व. यही पर भगवान बुद्ध का जन्म हुआ था वर्त्तमान में सम्राट अशोक का एक स्तंभ अवशेष के रूप में इस बात की सबूत पेश करता है .
  • बोधगया- यह भारत में गया धाम में स्थित है यही पर भगवान बुद्ध ने पीपल के पेड़ पर अपनी 6 वर्षो की तपस्या कर ज्ञान प्राप्त किया था. जिस वृक्ष पर उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई थी उसे बोधि वृक्ष अर्थात ज्ञान का वृक्ष कहा जाता है.
  • सारनाथ-  सारनाथ बनारस से 6 किलोमीटर दूर पड़ता है. सारनाथ में बोध-धर्मशाला है. यह लाखों की संख्या में बुद्ध के अनुयायी दर्शन के लिए आते है. यह भगवान का पहला उपदेश स्थल है इसी स्थल पर धर्म-चक्र-प्रवर्तन अभियान चलाया था. यह भगवान बुद्ध का प्राचीन मंदिर,चोखंडी स्तूप, चतुमुर्ख का सिंह स्तंभ आदि दर्शनीय स्थल है.
  • कुशीनगर- कुशीनगर बौद्ध अनुयायिओं का पवित्र स्थल है क्योकि यही पर बुद्ध ने निर्वाण को प्राप्त हुए थे.कुशीनगर के हिरण्यवती नदी के समीप ही अंतिम साँस ली थी. रंभर स्तुप के निकट उनका अंतिम संस्कार किया गया था. यह उत्तरप्रदेश के गोरखपुर से 55 km दूर कुशीनगर बौद्ध अनुयायिओं के आलावा पर्यटन प्रेमियों के लिए खास आकर्षण का केंद्र है.
  • दीक्षा भूमी- दिक्षभुमी नागपुर शहर में स्थित पवित्र एवं महत्वपूर्ण बौद्ध तीर्थ स्थल है. यही पर डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने १४ ओक्टुबर 1956 को विजयदशमी के दिन पहले स्वंम अपनी पत्नी सहित बौद्ध धर्म का दीक्षा ली थी और फिर 5 लाख हिंदु दलित समर्थकों को बौद्ध धर्म की दीक्षा दी थी. 1956 के बाद से हर साल देश-विदेश से 20-25 लाख बुद्ध और आंबेडकर के अनुयायी आते है.

कोई टिप्पणी नहीं: