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शनिवार, 27 जनवरी 2024

गुप्त साम्राज्य व उनके शासकों की सम्पूर्ण जानकारी


गुप्त साम्राज्य व उनके शासक
गुप्त साम्राज्य

गुप्त साम्राज्य प्राचीन भारत का एक तेली साम्राज्य था. गुप्तवंश का शासनकाल 240ई से 550 ई. तक था. 110 वर्षो तक लगभग पुरे भारतीय उपमहाद्वीप पर शासन किया. मौर्य वंश के पतन के पश्चात लम्बे समय तक प्राचीन भारत में कोई राजनितिक एकता स्थापित नही कर पाया था लेकिन गुप्त वंश ने नष्ट हुई राजनितिक अस्थिरता को पुनः एकता स्थापित किया. गुप्त वंश की उत्पत्ति तीसरी शताब्दी के अंत में प्रयाग के निकट कौशम्बी के रजा श्री गुप्त से हुई थी. श्री गुप्त एक भारशिवों के अधीन छोटे से राज्य के राजा था. श्रीगुप्त 240 ई. से 280 ई. तक वह के राजा था. उसके बाद उनके पुत्र घटोत्कच(280ई.-320 ई.) गुप्त साम्राज्य का शासक बना रहा. चौथी शताब्दी में एक स्वतंत्र गुप्त साम्राज्य की की स्थापना हुई. पहले स्वतंत्र साम्राज्य के शासक चंद्रगुप्त प्रथम था. जिन्होंने विवाह सम्बन्ध द्वारा अपने राज्य का विस्तार किया. चन्द्रगुप्त प्रथम ने लिच्छवी के राजकुमारी के साथ विवाह किया और एक जुटता की. पुत्र समुद्रगुप्त ने राज्य का विस्तार का कार्य किया. समुद्र गुप्त ने उतरी और पूर्वी भारत में तथा मध्य भारत और गंगा घाटी के शासको पर अपना अधिपत्य स्थापित किया. साम्राज्य के तीसरे शासक विक्रमादित्य ने उज्जैन तक साम्राज्य का विस्तार किया. इनके समय को स्वर्णिम युग कहा जाता है ये सांस्कृतिक और बौधिक उपलब्धियों के लिए प्रसिद्ध थे. इसके बाद उतराधिकारी के रूप में कुमार गुप्त व स्कंद गुप्त थे.

चन्द्र गुप्त प्रथम

सन् 320 में चन्द्रगुप्त प्रथम एक स्वतंत्र राजा बना. चन्द्रगुप्त ने लिच्छवी संघ को अपने साम्राज्य में मिला लिया. चन्द्रगुप्त का शासन काल 320 ई. से 335 ई. तक था. चन्द्रगुप्त ने लिच्छवीयों के सहयोग प्राप्त करने के लिए उनकी राजकुमारी कुमार देवी के साथ विवाह किया. विवाह के उपरांत चन्द्रगुप्त प्रथम को लिच्छवीयों का राज्य प्राप्त हुआ और वैशाली पर भी अपना अधिकार स्थापित किया.  लिच्छवियों के साथ सम्बंध स्थापित कर वह मगध साम्राज्य की स्थापना की. चन्द्रगुप्त प्रथम ने कौशम्बी तथा कौशल के महाराजाओं को जीतकर अपने राज्य में मिला लिया और पाटिलपुत्र को अपनी राजधानी घोषित की. चन्द्रगुप्त प्रथम 335 ई. में मृत्यु उपरांत उनके  पुत्र समुद्रगुप्त राज गद्दी पर विराजमान हुआ.

समुद्रगुप्त 

चन्द्रगुप्त प्रथम के बाद गुप्त साम्राज्य का वारिस 335 ई. में समुद्रगुप्त बना. समुद्रगुप्त ने लिछिवियों के दुसरे राज्य नेपाल को भी राज्य में मिलाया. समुद्रगुप्त का शासनकाल राजनैतिक एवं सांस्कृतिक दृष्ठि से गुप्त साम्राज्य का उत्कर्ष काल माना जाता है और प्राचीन भारतीय इतिहास में एक महान शासकों में मानित हुआ. समुद्रगुप्त अच्छे शासक के साथ एक अच्छे कवी तथा सगीतज्ञ भी था. समुद्रगुप्त के उदार,दानशील,असहायी तथा अनाथो को आश्रय दिया. समुद्रगुप्त की मृत्यु ३८० ई. में हुआ.समुद्रगुप्त के दो पुत्र थे रामगुप्त और चन्द्रगुप्त द्वितिया. पिता के मृत्यु के पश्चात रामगुप्त राजा बना किन्तु शकराज से बुरी तरह हारने के कारण तथा संधि में अपनी पत्नी को शकराज को देने के वादे से वह अत्यंत निंदनीय हो गया. उसके पश्चात चन्द्रगुप्त द्वितीय या विक्रमादित्य रामगुप्त की हत्या कर गुप्तवंश का शासक बना.

चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य 

चन्द्रगुप्त द्वितीय 375 ई. में सिहासन पर बैठा था. पिता समुद्रगुप्त और माता महिसी दत्तदेवी थी. चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य के नाम से इतिहास में प्रसिद्ध हुआ. अपने भाई की हत्या कर सिहासन प्राप्त की और ४० वर्षो तक(375 ई.-४१४ ई.) शासन किया. चन्द्रगुप्त द्वितीय का विवाह नाग कुमारी कुबेर नाग के साथ तथा अपने भाई की पत्नी ध्रुवस्वामिनी के साथ हुआ. कुबेर नाग से एक पुत्री प्रभावती गुप्त तथा ध्रुवस्वामिनी से पुत्र कुमार गुप्त प्रथम हुआ. चन्द्रगुप्त ने शाकवंश को परास्त करने के लिए पुत्री का विवाह वाकाटक नरेश रुद्रसेन द्वितीय के साथ तथा पुत्र का विवाह  कदम्ब राजवंश में कराया. इसके बाद शकवंशों का पतन कर गुजरात व मालवा के प्रदेश पर राज कर एक शक्तिशाली साम्राज्य का विस्तार किया. इस विजय के बाद उज्जैन गुप्त साम्राज्य का नया राजधानी बना.

चन्द्रगुप्त द्वितीय का साम्राज्य विस्तार 

  • शकवाहों की पराजय - गुजरात व मालवा के प्रदेश पर आक्रमण कर अपने अधीन किया.
  • वाहीक पर विजय- चन्द्रगुप्त द्वितीय ने सिन्धु के पांच मुखो पर विजय प्राप्त किया और पंजाब तक अधीन कर लिया.
  • बंगाल राज्यों को अपने अधीन किया- बंगाल के शासकों पर विजय प्राप्त किया और अपने अधीन किया.
  • गणराज्यों की विलय- समुद्रगुप्त के मृत्यु के पश्चात कई अपने गणराज्य स्वतत्र घोषित कर लिया था. किन्तु चन्द्रगुप्त द्वितीय ने उन्हें वापास अपने अधीन कर लिया.
चन्द्रगुप्त द्वितीय का शासन कला और सहित्य के लिए स्वर्णिम युग था. चन्द्र गुप्त ने कला और साहित्य प्रिय को अपने राज्य में आश्रय दिया था. सन् 414 में मृत्यु उपरांत कुमार गुप्त गुप्तवंश के नया शासक बना.

कुमार गुप्त प्रथम 

कुमार गुप्त, चन्द्रगुप्त द्वितीय के मृत्यु के पश्चात 415 ई. में गद्दी पर बैठा. कुमार गुप्त अपने दादा की तरह अश्वमेघ यज्ञ के सिक्के जारी किया. कुमार गुप्त का शासन काल (415 ई - 455 ई.) 40 वर्षो तक शासन किया. अपने भाई गोविन्द गुप्त को वैशाली का राज्यपाल बनाया. कुमार गुप्त के समय राज्य में शांति और सुव्यवस्थित था. वह अपने साम्राज्य की पूर्णरूप से रक्षा की थी. कुमार गुप्त के शासन में ही नालल्दा विश्वविद्यालय की स्थापना की गयी. कुमार गुप्त प्रथम स्वम वैष्णव धर्म के अनुयायी होते हुए भी अन्य धर्मो का सम्मान किया. कुमार गुप्त के समय कई घटनाएँ घटी थी जैसे पुष्यमित्र ने गुप्त साम्रज्य पर हमला कर दिया था. जिसके उत्तर के रूप में कुमार गुप्त के पुत्र स्कंद गुप्त ने युद्ध लड़ा और पुष्यमित्र को परास्त किया. विजय यात्रा यानि कुमार गुप्त ने अश्वमेघ यज्ञ कराया था.

स्कंदगुप्त 

स्कंदगुप्त पिता के मृत्यु के बाद 455 ई. में सिहासन पर बैठा. स्कंदगुप्त का शासन काल 12 वर्षो की थी. स्कंदगुप्त गुप्त को सुरुवाती समय में वाकाटक शासन नरेन्द्र ने विद्रोह कर मालवा पर अधिकार कर लिया था. किन्तु स्कंदगुप्त ने उसे परास्त कर अपने राज्य में मिला लिया. स्कंदगुप्त एक अच्छा राजा था वह अपने प्रजा की चिंता रहती थी. स्कंदगुप्त शासन काल में संघर्षो की काल था हुण पश्चिम से रोमन साम्राज्य ने गुप्तवंश को हमेशा चुनौती दी. हुण के गंधार पर जीत के बाद गुप्तवंश ने हुण को बुरी तरह परास्त किया. चाचा गोविन्द गुप्त ने भी विद्रोह किया और मालवा पर कब्ज़ा किया. किन्तु स्कंदगुप्त ने इस विद्रोह का दमन किया. स्कंदगुप्त की मृत्यु 467 ई. में हुआ. स्कंदगुप्त के मृत्यु उपरांत सौतेले भाई पुरुगुप्त शासक बने किन्तु वृद्धा अवस्था होने के कारण वह राज्य को सही से सभाल नही पाया था. जिसके बाद धीरे-धीरे गुप्त वंश पतन की ओर बड़ा. 

इसके बाद और भी राजा हुए जो स्कंदगुप्त के मृत्यु पश्चात 467 ई. से 550 ई. तक शासन किया किन्तु स्कंदगुप्त के शासन के बाद गुप्तवंश का पतन शुरू हो गया था.  

गुप्त साम्राज्य की वंशावली 

  • श्री गुप्त प्रथम (3 री शताब्दी के अंत में -280 ई.)
  • घटोत्कच ( 280 ई. - 319 ई.)
  • चन्द्रगुप्त प्रथम (319 ई. - 335 ई.)
  • समुद्रगुप्त (335 ई. - 375 ई.)
  • रामगुप्त ( 375 ई.)
  • चन्द्रगुप्त द्वितीय ( 375 ई. - 415 ई.)
  • कुमार गुप्त प्रथम ( 415 ई. - 455 ई. )
  • स्कंदगुप्त ( 455 ई. - 467 ई.)
  • पुरुगुप्त ( 467 ई. - 473 ई. )
  • कुमार गुप्त द्वितीय ( ४७३ ई.-४७६ ई.)
  • बुद्ध गुप्त ( ४७६ ई. - 495 ई.)
  • नरसिंह गुप्त ( 495 ई. - 530 ई.)
  • कुमार गुप्त तृतीय ( 530 ई. - 540 ई.)
  • विष्णु गुप्त ( 540 ई. - 550 ई.)  

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